न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता, उमर ख़ालिद और स्वतंत्रता का संकट
एक संवैधानिक प्रस्ताव, राजनीतिक आग्रह नहीं
I. एक संवैधानिक प्रस्ताव, राजनीतिक आग्रह नहीं
यह लेख एक ऐसे प्रस्ताव से आरम्भ होता है जो पहली दृष्टि में उत्तेजक लग सकता है, किंतु जिसका आशय आरम्भ से अंत तक राजनीतिक नहीं, संवैधानिक है: भारत को ज़मानत के प्रश्न पर न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की आवाज़ फिर सुननी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि कोई भविष्यवाणी कर सकता है कि वे उमर ख़ालिद के मामले में क्या निर्णय देते; न किसी वादी को अपनी पसंद का सहानुभूतिशील न्यायाधीश चुनने का अधिकार है; और न किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की व्यक्तिगत या दार्शनिक मान्यताएँ किसी विशेष अधिनियम के अंतर्गत ज़मानत की वैधानिक कसौटी का स्थान ले सकती हैं। यह प्रस्ताव उस विरोधाभास से उपजता है जिसे अब अनदेखा करना कठिन है। भारतीय संवैधानिक विधि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निर्दोषता की धारणा और त्वरित विचारण के अधिकार का निरंतर उत्सव मनाती है। फिर भी 7 सितंबर 2026 को द ट्रिब्यून में प्रकाशित अपने लेख “स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ” में—उमर ख़ालिद की बिना विचारण आरम्भ हुए हिरासत के छह वर्ष पूरे होने से कुछ दिन पहले—न्यायमूर्ति गुप्ता ने पूछा कि उसकी स्वतंत्रता और त्वरित विचारण के अधिकार का क्या हुआ। उनका निष्कर्ष कठोर था: व्यवहार में “ज़मानत नियम, जेल अपवाद” का सिद्धांत उलट चुका है और प्रक्रिया स्वयं दंड बन गई है।
यह भी महत्त्वपूर्ण है कि वह लेख किसी एक मामले पर नहीं, भारत के अस्सीवें स्वतंत्रता दिवस की पृष्ठभूमि में लिखा गया था। न्यायमूर्ति गुप्ता की चिंता दलीय नहीं, संस्थागत थी—विचाराधीन कैद की संरचना, न्यायिक नियुक्तियों की अपारदर्शिता और न्यायपालिका के भीतर बढ़ती संख्या में कथित “काली भेड़ों” को लेकर। उमर ख़ालिद का मामला अनेक उदाहरणों में से एक था, लेख का एकमात्र विषय नहीं। फिर भी वर्तमान लेख उसी उदाहरण के आसपास निर्मित है, क्योंकि सिद्धांत और विलंब के बीच तनाव शायद इसी मामले में सबसे तीखा दिखाई देता है।
II. लेखक की स्थिति का प्रकटीकरण
आगे बढ़ने से पहले प्रकटीकरण आवश्यक है। लेखक एक अधिवक्ता के रूप में लगभग दो सौ ज़मानत मामलों में बहस कर चुका है और ज़मानत, गिरफ्तारी तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर लगातार लिखता रहा है। उसने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनावों के संचालन में तीन अवसरों पर भाग लिया और उस प्रक्रिया में उसकी भूमिका निष्कलंक रही। ये बातें अधिकार स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कही जा रही हैं कि लेखक के अनुभव के इतने निकट विषय पर पाठक को पहले से मालूम हो कि वह कहाँ खड़ा है—और तब वह परख सके कि निष्कर्ष विधि से निकलते हैं या परिचय से।
इस लेख के लिए जेएनयू की राजनीति कोई अमूर्त धारणा नहीं है। वह विचारधारा, मित्रता, मतभेद, भाषण और चुनावी प्रतिस्पर्धा की असाधारण रूप से सक्रिय प्रयोगशाला है; भारतीय न्यायालयों ने भी कभी-कभी उसे साधारण “छात्र राजनीति” से कहीं अधिक गंभीर संस्थागत विषय माना है। मार्च 2024 में Sakshi v. Jawaharlal Nehru University, 2024:DHC:2109 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने, चुनाव-पूर्व आम सभा में उचित प्रक्रिया का प्रथमदृष्टया पालन न होने की न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की टिप्पणी के बाद, उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति वी. रामसुब्रमणियन को जेएनयू छात्र संघ चुनाव समिति का पर्यवेक्षक नियुक्त किया। यह तथ्य उमर ख़ालिद के विषय में कुछ सिद्ध नहीं करता; वह केवल बताता है कि जिस राजनीतिक वातावरण से यह मामला निकला, उसे भारतीय विधि-व्यवस्था ने कभी पूरी तरह तुच्छ नहीं माना।
एक और निजी प्रकटीकरण भी आवश्यक है। मेरठ के अल्बर्ट बैसोया लेखक के निकट मित्रों में हैं। विश्वविद्यालय की राजनीति से उत्पन्न बातचीतों के माध्यम से ही लेखक ने उमर ख़ालिद को पहले किसी आपराधिक मुकदमे के नाम के रूप में नहीं, बल्कि पूर्व छात्र और राजनीतिक सहभागी के रूप में जाना। चुनावी यात्राओं के दौरान मॉब लिंचिंग, सांप्रदायिक हिंसा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी और ख़ालिद के अभियोजन पर अनेक चर्चाएँ हुईं। यह जानकारी इसलिए दी जा रही है क्योंकि इसे साक्ष्य नहीं माना जा सकता। मित्रता निर्दोषता सिद्ध नहीं करती; किसी व्यक्ति को “अच्छा आदमी” मानना ज़मानत की किसी वैधानिक शर्त को पूरा नहीं करता। संवैधानिक निर्णय ऐसा होना चाहिए जो हर निजी संबंध को तर्क से हटा देने के बाद भी अपने पैरों पर खड़ा रहे।
III. उपेक्षित छात्र तर्क
फिर भी ख़ालिद की स्वतंत्रता के पक्ष में एक बात पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुई: वह छात्र राजनीति से निकला था, और छात्र राजनीतिक भूलें कर सकते हैं। इसे गलत न समझा जाए। छात्र होना आपराधिक विधि से प्रतिरक्षा नहीं है; हिंसा, आतंकवाद या षड्यंत्र सिद्ध हो तो युवावस्था कोई क्षमा नहीं देती। लेकिन संवैधानिक लोकतंत्र को मूर्खतापूर्ण राजनीति, असंयत भाषा, वैचारिक अतिवाद, विवादास्पद व्यक्तियों से संबंध, गैर-कानूनी आचरण और आतंकवादी षड्यंत्र में भागीदारी के बीच अंतर करना आना चाहिए। ये परस्पर विनिमेय विधिक श्रेणियाँ नहीं हैं। विश्वविद्यालय उन विरले संस्थानों में है जहाँ नागरिक राजनीति सीखते हैं—कभी-कभी राजनीति को गलत समझकर ही। जो विधि-व्यवस्था राजनीतिक भूल और आपराधिक षड्यंत्र में अंतर नहीं कर सकती, वह आपराधिक कानून के लिए आवश्यक विश्लेषणात्मक क्षमता खो चुकी है।
IV. न्यायमूर्ति गुप्ता की न्यायिक शब्दावली
न्यायमूर्ति गुप्ता सितंबर 2026 में अचानक इस विचार तक नहीं पहुँचे। सितंबर 2019 में अहमदाबाद में अधिवक्ताओं की कार्यशाला के समापन व्याख्यान “भारत में राजद्रोह का कानून और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” में उन्होंने कहा था कि कार्यपालिका, न्यायपालिका, नौकरशाही या सशस्त्र बलों की आलोचना मात्र राजद्रोह नहीं है और संसदीय बहुमत पा लेने से बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र का कानून नहीं बन जाता। साथ ही उन्होंने विधि की सीमा भी बचाए रखी: असहमति तभी तक संरक्षित है जब तक वह हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था के दंडनीय उकसावे में न बदले। अप्रिय अभिव्यक्ति और गैर-कानूनी हिंसा का यही भेद राजनीतिक रूप से संवेदनशील अभियोजनों में न्यायालयों को असाधारण अनुशासन के साथ सुरक्षित रखना चाहिए।
फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित “लोकतंत्र और असहमति” व्याख्यान में उन्होंने राज्य और तत्कालीन सरकार के बीच अंतर स्पष्ट किया। सरकार की आलोचना राज्य के प्रति विश्वासघात नहीं है; मामूली बहुमत पाने वाला दल यह अपेक्षा नहीं कर सकता कि शेष मतदाता अगले चुनाव तक मौन रहें। उनका आशय असहमत लोगों को संविधान पर कोई श्रेष्ठ अधिकार देना नहीं था, बल्कि यह था कि कार्यशील लोकतंत्र सत्ता से असहमति के लिए संवैधानिक स्थान माँगता है। अल्पमत की आवाज़ को केवल उसके अल्पमत होने के कारण दबाना लोकतंत्र की अभिव्यक्ति नहीं, उसका प्रतिलोम है। छह वर्ष बाद पढ़ने पर 2026 का हस्तक्षेप सेवानिवृत्ति के बाद खोजा गया नया दर्शन नहीं, उसी न्यायिक सोच की निरंतरता है।
V. वास्तविक निर्णय का सामना: Gulfisha Fatima v. State
न्यायमूर्ति गुप्ता का आह्वान करने से पहले उमर ख़ालिद के वास्तविक ज़मानत निर्णय का ईमानदारी से सामना करना होगा। 5 जनवरी 2026 को न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के कथित “वृहत्तर षड्यंत्र” से संबंधित सात अपीलों में Gulfisha Fatima v. State (Govt. of NCT of Delhi), 2026 INSC 2 का निर्णय दिया। पाँच अपीलकर्ताओं—गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफ़ा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम ख़ान और शादाब अहमद—को ज़मानत मिली; उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को नहीं। न्यायालय ने सातों को समान नहीं माना। अभियोजन के अपने कथन में दिखाई देने वाली “सहभागिता की पदानुक्रमित संरचना” में उसने ख़ालिद और इमाम की कथित भूमिकाओं को सहायक नहीं, केंद्रीय और प्रारूप-निर्माता माना। गंभीर स्वतंत्रता-तर्क को इस भेद को स्वीकार करना होगा; निर्णय को केवल “एक असहमत व्यक्ति को ज़मानत नहीं मिली” कहना सरल, किंतु अशुद्ध होगा।
यह निर्णय समकालीन ज़मानत-विधि का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। इसमें दीर्घ कारावास और अनुच्छेद 21, गैर-कानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम अर्थात UAPA की धारा 43D(5), अधिनियम में “आतंकवादी कृत्य” का अर्थ, प्रत्येक अभियुक्त की पृथक भूमिका तथा शरजील इमाम और उमर ख़ालिद के विशिष्ट मामलों पर विचार किया गया। ख़ालिद से संबंधित भाग में उसकी दलीलें, राज्य का उत्तर, अधीनस्थ न्यायालयों के निष्कर्ष और पीठ द्वारा सामग्री का मूल्यांकन सम्मिलित है। इसलिए यह कहना उचित नहीं कि न्यायालय ने स्वतंत्रता के प्रश्नों को देखा ही नहीं। कठिनाई उस वैधानिक संरचना में है जिसके भीतर न्यायालय को कार्य करना था।
VI. UAPA की संरचना और प्रथमदृष्टया कसौटी
वास्तविक संवैधानिक कठिनाई इसी संरचना में है। Gulfisha Fatima पीठ ने पूर्ववर्ती निर्णयों के अनुरूप कहा कि धारा 43D(5) के अधीन ज़मानत पर विचार करते समय न्यायालय कोई लघु-विचारण नहीं करता और न बचाव तथा अभियोजन के साक्ष्य का अंतिम तुलनात्मक मूल्यांकन करता है। प्रश्न इतना है कि वैधानिक प्रथमदृष्टया स्तर पर अभियोजन-सामग्री ज़मानत-प्रतिबंध को सक्रिय करने वाले आवश्यक अवयव दिखाती है या नहीं। इसीलिए “ज़मानत नियम है” का सामान्य सूत्र अकेले UAPA का मामला तय नहीं कर सकता। संसद ने जानबूझकर अधिक कठोर व्यवस्था बनाई है; व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति संस्थागत सहानुभूति उस व्यवस्था को कानून की पुस्तक से मिटा नहीं सकती। शेष संवैधानिक प्रश्न अधिक संकीर्ण और कठिन है: दोषसिद्धि के बिना वर्षों की कैद और विचारण शुरू न होने की स्थिति में इस कठोर व्यवस्था का क्या होगा?
VII. आरोप न्यायनिर्णयन नहीं है
धारा 43D(5) के अंतर्गत ज़मानत अस्वीकार करने योग्य प्रथमदृष्टया निष्कर्ष संदेह से परे अपराध-सिद्धि नहीं है और कभी था भी नहीं। केवल इसलिए कि दो न्यायालयों ने ज़मानत के स्तर पर अभियोजन-सामग्री को पर्याप्त माना, उमर ख़ालिद दोषसिद्ध अपराधी नहीं हो जाता। दूसरी ओर, छह वर्ष की कैद के बाद भी दोषसिद्धि न होने को समर्थक अभियोजन के मनगढ़ंत होने का प्रमाण नहीं मान सकते। दोनों अतिशयोक्तियाँ एक अंतरिम कसौटी को अंतिम निर्णय में बदलकर दंड प्रक्रिया को समान रूप से क्षति पहुँचाती हैं। विचारण इसलिए आवश्यक है कि ज़मानत-निर्णय और दोष-निर्धारण अलग संवैधानिक कार्य हैं।
VIII. विभाजित न्यायशास्त्र: Andrabi का मतभेद
जनवरी 2026 के बाद महत्त्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ कि उच्चतम न्यायालय के बाद के न्यायशास्त्र ने राजनीतिक आलोचना से नहीं, नज़ीर के आधार पर Gulfisha Fatima के दृष्टिकोण पर प्रश्न उठाया। 18 मई 2026 को न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने Syed Iftikhar Andrabi v. National Investigation Agency, 2026 INSC 503 में लगभग छह वर्ष से UAPA के अधीन बंद अभियुक्त को ज़मानत दी। पीठ ने Gulfisha Fatima और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार द्वारा लिखित Gurwinder Singh v. State of Punjab, (2024) 6 SCC 16 से स्पष्ट असहमति व्यक्त की। उसके अनुसार दोनों निर्णय Union of India v. K.A. Najeeb, (2021) 3 SCC 713 की बाध्यकारी तीन-न्यायाधीशीय नज़ीर से हटे थे, जिसमें कहा गया था कि असाधारण दीर्घकालिक विचाराधीन कैद UAPA की कठोर धारा 43D(5) के बावजूद ज़मानत का स्वतंत्र संवैधानिक आधार बन सकती है। दो-न्यायाधीशीय पीठ तीन-न्यायाधीशीय निर्णय से बंधी है; हिरासत की अवधि को केवल वैधानिक प्रतिबंध के कारण संवैधानिक रूप से अप्रासंगिक नहीं बनाया जा सकता।
इससे UAPA ज़मानत पर उच्चतम न्यायालय के भीतर वास्तविक और स्वीकृत मतभेद उत्पन्न हुआ। Andrabi के तुरंत बाद न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले की पीठ ने Tasleem Ahmed v. State (Govt. of NCT of Delhi) में इन दोनों धाराओं के बीच “प्रत्यक्ष मतभेद” को स्वीकार किया, दीर्घ कारावास के आधार पर UAPA ज़मानत का प्रश्न वृहत्तर पीठ को भेजा और संदर्भ लंबित रहते अपीलकर्ताओं को अंतरिम ज़मानत दी। न्यायमूर्ति गुप्ता ने सितंबर के लेख में इसी विकास की ओर संकेत किया था। यह ख़ालिद की हिरासत को असंवैधानिक घोषित करने वाला निर्णय नहीं है; लेकिन यह न्यायालय के भीतर औपचारिक स्वीकारोक्ति अवश्य है कि निरंतर कैद का विधिक आधार अनिश्चित है और प्रामाणिक समाधान हेतु वृहत्तर पीठ के समक्ष लंबित है।
IX. छात्र तर्क का सही पुनर्गठन
अब “छात्र” तर्क को क्षमादान की याचना नहीं, विश्लेषण की पद्धति के रूप में रखा जाना चाहिए। यह नहीं कि “उमर छात्र था, इसलिए उसे क्षमा कर दीजिए”; बल्कि यह कि आरोप को ठीक-ठीक पहचानिए, अभिव्यक्ति को आचरण से, संबंध को षड्यंत्र से और राजनीतिक भूल को आपराधिक आशय से अलग कीजिए। फिर पूछिए कि छह वर्ष से अधिक समय के बाद आज शेष कौन-सा वास्तविक खतरा है जिसके लिए कारावास आवश्यक है—विशेषकर तब जब धारा 43D(5) की निर्णायक कसौटी स्वयं वृहत्तर पीठ के समक्ष लंबित हो। समय साक्ष्य को मिटा नहीं सकता, पर आपराधिक प्रक्रिया को किसी मनुष्य को उसके जीवन के एक राजनीतिक क्षण में स्थायी रूप से जमा देने की अनुमति भी नहीं होनी चाहिए।
X. ज़मानत का भावी चरित्र
ज़मानत अतीतोन्मुख ही नहीं, भविष्योन्मुख भी है। कथित अपराध अतीत में हुआ, लेकिन हिरासत का औचित्य वर्तमान में हर दिन बना रहना चाहिए। क्या अभियुक्त फरार हो सकता है? क्या गवाहों की सुरक्षा निरंतर हिरासत के बिना संभव नहीं? क्या संचार, यात्रा, पासपोर्ट समर्पण या नियमित उपस्थिति जैसी कठोर शर्तें जोखिम सँभाल सकती हैं? छह वर्ष बाद साक्ष्य से छेड़छाड़ की वास्तविक संभावना क्या है? कितने गवाह शेष हैं, मुकदमा कितना बाकी है और संभावित दोषसिद्धि की सज़ा की तुलना में कितनी कैद पहले ही काटी जा चुकी है? अनुच्छेद 21 लागू करने वाला संवैधानिक न्यायालय अंततः केवल “तब क्या हुआ था” नहीं, यह भी पूछेगा: 2020 के बाद जो हुआ और जो नहीं हुआ, उसके आलोक में इस असिद्धदोष व्यक्ति को आज जेल में रखना क्यों आवश्यक है?
XI. राजनीति को राजनीति में लौटाना
लेखक एक कदम और आगे जाता है। यदि उमर ख़ालिद राष्ट्रीय राजनीति में गंभीर भूमिका चाहता है और विधि उसकी रिहाई की अनुमति देती है, तो उसकी राजनीति की अंतिम परीक्षा जेल नहीं, लोकतंत्र करे। पत्रकार उससे प्रश्न करें, पूर्व छात्र चुनौती दें और राजनीतिक विरोधी उसके प्रत्येक विवादित भाषण की जाँच करें। वह अपने आशय को स्पष्ट करे और यदि उसे लगता है कि भूलें हुईं तो उन्हें स्वीकार करे। नागरिक उसकी राजनीति को अस्वीकार करें या समर्थन दें। यह किसी आपराधिक आरोप से बरी करना नहीं और लंबित विचारण का विकल्प नहीं। इसका अर्थ केवल दो संस्थाओं को अलग रखना है: आपराधिक उत्तरदायित्व का निर्णय अदालत करे; राजनीतिक उत्तरदायित्व का निर्णय लोकतांत्रिक समाज। अनिश्चितकालीन विचाराधीन कैद के माध्यम से दूसरे प्रश्न का निर्णय करना इस मूल भेद को त्याग देना होगा।
XII. प्रतीकात्मक कैद का खतरा
लंबी विचाराधीन कैद एक और खतरा पैदा करती है: पीड़ितत्व राजनीतिक पूँजी बन सकता है और वह पूँजी मामले को विकृत कर सकती है। अभियुक्त धीरे-धीरे व्यक्ति कम, व्यापक राजनीतिक पहचानों का प्रतीक अधिक बन जाता है। समर्थक उसकी हर आलोचना को दमन का समर्थन मानते हैं; विरोधी आरोप को दोषसिद्धि की तरह प्रस्तुत करते हैं। दोनों प्रवृत्तियाँ उस विचारण की सहायता नहीं करतीं जिसे दोनों पक्ष कथित रूप से पूरा होते देखना चाहते हैं। जहाँ कैद विधिक रूप से आवश्यक नहीं रह गई हो, वहाँ ज़मानत एक अप्रत्याशित लोकतांत्रिक कार्य करती है—वह राजनीति को राजनीति में और आपराधिक न्याय को अदालत में वापस भेज देती है।
XIII. द्विआधारी न्यायशास्त्र के विरुद्ध
राजनीतिक रूप से संवेदनशील ज़मानत मामलों की टिप्पणी प्रायः इसी मध्यभूमि को खो देती है। ज़मानत देने वाला न्यायाधीश तुरंत स्वतंत्रता का नायक और इंकार करने वाला अधिनायकवादी घोषित कर दिया जाता है। न्यायशास्त्र चुनावी प्रचार की भाषा में नहीं लिखा जा सकता। ज़मानत देने वाला न्यायाधीश गलत नज़ीर बना सकता है; इंकार करने वाला ईमानदारी से वैधानिक प्रतिबंध लागू कर सकता है। दोनों निर्णयों की आलोचना नज़ीर, साक्ष्य और संवैधानिक सिद्धांत से होनी चाहिए, निजी मंशा के अनुमान से नहीं। इसलिए Gulfisha Fatima की आलोचना अनुच्छेद 21, विलंब, नज़ीर और धारा 43D(5) के आधार पर हो—वैसी ही आलोचना जैसी बाद की Andrabi और Tasleem Ahmed पीठों ने पर्याप्त अंश में स्वयं की है।
XIV. एक मामले से आगे: स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ
न्यायमूर्ति गुप्ता का सितंबर 2026 का लेख इसलिए अधिक बेचैन करता है क्योंकि वह एक ज़मानत आदेश से बहुत आगे जाता है। वे कहते हैं कि हाल के समय में संवैधानिक न्यायालयों ने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपेक्षित संवेदनशीलता और संस्थागत शक्ति नहीं दिखाई। वे ADM Jabalpur v. Shivkant Shukla, (1976) 2 SCC 521 में न्यायमूर्ति एच. आर. खन्ना के एकाकी असहमति-मत को संवैधानिक आपातकाल में न्यायिक साहस का स्थायी मानदंड मानते हैं; बताते हैं कि जेलों में दोषसिद्ध कैदियों से कहीं अधिक विचाराधीन बंदी हैं—लगभग तीन-चौथाई आबादी विचारण की प्रतीक्षा में है; उमर ख़ालिद के साथ एल्गार परिषद मामले का उल्लेख करते हैं, जहाँ एक अभियुक्त की विचारण से पहले हिरासत में मृत्यु हुई; सोनम वांगचुक की लंबी हिरासत और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं के तत्काल निर्णय की आवश्यकता उठाते हैं; न्यायिक नियुक्तियों की अपारदर्शिता और उच्चतर न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व की कमी पर प्रश्न करते हैं; और स्वतंत्र बार की अनिवार्यता पर बल देते हैं। यह किसी एक अभियुक्त के समर्थक की अपील नहीं, दशकों तक संस्था के भीतर रहे न्यायाधीश का संस्थागत आत्मपरीक्षण है।
न्यायपालिका में बढ़ते बहुसंख्यकवाद का उनका आरोप अत्यंत गंभीर है; उसे केवल प्रतिष्ठित पूर्व न्यायाधीश द्वारा कहे जाने से स्थापित सत्य नहीं माना जा सकता। वे विभिन्न धार्मिक समुदायों से जुड़े मामलों में ज़मानत और स्वतंत्रता के असमान व्यवहार की तुलना करते हैं, प्रेस में “गंगा की नाव पर चिकन” विवाद कहे गए प्रसंग का उल्लेख करते हैं, ज्ञानवापी मस्जिद मुकदमे की पृष्ठभूमि में पूजा-स्थल न्यायशास्त्र के बाद के विकास पर प्रश्न उठाते हैं और किसी नियुक्त व्यक्ति पर निजी आक्षेप किए बिना उच्चतर न्यायपालिका में सामाजिक विविधता की अपर्याप्तता बताते हैं। इन दावों को निर्णयों, हिरासत-अवधि, अपराधों और तुलनात्मक आँकड़ों से जाँचना चाहिए। अल्पसंख्यकों की संवैधानिक रक्षा अनिवार्य है, किंतु अल्पसंख्यकों का रोमानीकरण कानून नहीं; उसी तरह बहुसंख्यक इच्छा भी कानून नहीं। न्यायालय को दोनों से संवैधानिक दूरी रखनी है।
फिर भी मूल चेतावनी को सहजता से खारिज नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश की सबसे कठिन परीक्षा लोकप्रिय अभियुक्त के मामले में नहीं होती। जहाँ जनसहानुभूति पहले से कैदी के साथ हो, वहाँ प्रक्रिया की रक्षा में थोड़ा ही साहस चाहिए। अनुच्छेद 21 का ऐतिहासिक अर्थ तब खुलता है जब जनमत, कार्यपालिका, राजनीतिक वाक् और राष्ट्रीय सुरक्षा के आरोप एक दिशा में हों—और न्यायाधीश फिर भी पूछे कि क्या राज्य ने आज भी स्वतंत्रता छीनने का पर्याप्त वैधानिक तथा संवैधानिक आधार दिखाया है। न्यायमूर्ति गुप्ता द्वारा 2020 और 2026 दोनों में न्यायमूर्ति खन्ना का स्मरण इसलिए औपचारिक श्रद्धांजलि से कहीं अधिक है।
XV. संस्थागत परिचय
न्यायमूर्ति गुप्ता ने 1978 में दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय के कैंपस लॉ सेंटर से विधि की डिग्री ली और अगले छब्बीस वर्ष हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में संवैधानिक, दीवानी और कॉरपोरेट विधि की प्रैक्टिस की। 4 अक्टूबर 2004 को वे उसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने, दो बार कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रहे और पर्यावरणीय “हरित पीठ” का नेतृत्व किया। 23 मार्च 2013 को त्रिपुरा उच्च न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश, 16 मई 2016 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और 17 फरवरी 2017 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बने। 6 मई 2020 को सेवानिवृत्ति तक उन्होंने उच्चतम न्यायालय में लगभग 139 रिपोर्टेड निर्णय लिखे, जिनमें सबसे बड़ा भाग आपराधिक विधि का था। विधिक सेवा, न्यायिक शिक्षा और हिमाचल में न्यायालयों के कंप्यूटरीकरण में भी उनका उल्लेखनीय कार्य रहा। यह बाहर से टिप्पणी करने वाले व्यक्ति की जीवनी नहीं, उच्चतर न्यायपालिका में सोलह वर्ष बिताने वाले न्यायाधीश की संस्थागत पृष्ठभूमि है।
XVI. प्रस्ताव की सीमा: मनपसंद न्यायाधीश के विरुद्ध
“न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता को फिर ज़मानत सुननी चाहिए” कहते समय संवैधानिक अनुशासन आवश्यक है। कोई वादी उस न्यायाधीश को नहीं चुन सकता जिसकी प्रकाशित न्यायिक दृष्टि उसे अनुकूल लगती हो। ख़ालिद का मामला काल्पनिक रूप से भी केवल इसलिए न्यायमूर्ति गुप्ता को नहीं दिया जा सकता कि उन्होंने उसकी स्वतंत्रता पर सार्वजनिक प्रश्न उठाए हैं। ऐसा करना न्यायिक स्वतंत्रता की माँग को judge-shopping—मनपसंद न्यायाधीश चुनने की प्रवृत्ति—में बदल देगा। सही प्रस्ताव व्यक्तिगत नहीं, संस्थागत है: क्या आयोगों, परामर्श निकायों या जहाँ संविधान अनुमति दे वहाँ विशेषीकृत व्यवस्थाओं में अनुभवी सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की सेवाओं का बेहतर उपयोग हो सकता है? क्या स्वतंत्रता के मामलों को अधिक विशेषज्ञ, शीघ्र और बौद्धिक रूप से सुसंगत सूची-व्यवस्था मिलनी चाहिए—विशेषकर जब विधि का प्रश्न वृहत्तर पीठ को भेजा जा चुका हो और उसके बीच लोग हिरासत में हों?
XVII. न्यायिक साहस की सही परिभाषा
इस प्रस्ताव का अर्थ यह नहीं कि न्यायमूर्ति गुप्ता आज मामला सुनते तो ज़रूर ज़मानत देते। यही अनिश्चितता तर्क का सार है। अच्छा स्वतंत्रता-न्यायाधीश ज़मानत देने की मशीन नहीं होता। साक्ष्य और विधि माँगें तो उसे निर्भयता से इंकार करना चाहिए; संविधान माँगे तो शक्तिशाली राज्य, राजनीतिक रूप से विस्फोटक आरोप और अलोकप्रिय रिहाई के बावजूद ज़मानत देनी चाहिए। उसका स्वामी न सरकार हो, न विपक्ष, न सोशल मीडिया, न अकादमिक लॉबी और न अभियुक्त का राजनीतिक समुदाय। न्यायिक साहस “उदार परिणाम” लगातार देने में नहीं, प्रत्येक इच्छुक पक्ष के वांछित परिणाम से बौद्धिक स्वतंत्रता बनाए रखने में है।
XVIII. सद्गुण से स्वतंत्र अधिकार
इसीलिए “उमर ख़ालिद अच्छा आदमी है” इस लेख के कानूनी केंद्र से बाहर रहना चाहिए। शायद वह है; शायद अनेक पाठक गहराई से असहमत हों। संविधान केवल अच्छे मनुष्यों के लिए नहीं लिखा गया। लाभार्थी के सद्गुण पर निर्भर संवैधानिक गारंटी अधिकार नहीं, कृपा है। यदि छात्र जीवन में भूल हुई तो उसे भूल कहा जाए; संरक्षित असहमति थी तो संरक्षित किया जाए; अपराध था तो विचारण हो; आतंकवादी षड्यंत्र था तो कानून की अपेक्षित कसौटी पर सिद्ध किया जाए। इन अलग श्रेणियों को केवल इसलिए एक न बनाया जाए कि लंबी कैद ने आरोप को समाज की दृष्टि में दोषसिद्धि जैसा रूप दे दिया है। ज़मानत दोषमुक्ति नहीं; आरोप दोषसिद्धि नहीं।
XIX. निष्कर्ष: स्वतंत्रता की लड़ाई का क्षण
उमर ख़ालिद का मामला स्वयं उमर ख़ालिद से बड़ा है। वह पूछता है कि विशेष अधिनियमों का ज़मानत-न्यायशास्त्र अनुच्छेद 21 की स्वतंत्र शक्ति के साथ कैसे सामंजस्य पाए; बड़े षड्यंत्र-मुकदमों में वर्षों लगें तो त्वरित विचारण व्यावहारिक अधिकार कैसे रहे; भाषणों और संदेशों पर आधारित मामले में राजनीतिक अभिव्यक्ति को आपराधिक सहभागिता से कैसे अलग किया जाए; क्या दीर्घ कैद निरंतर विचाराधीन हिरासत के औचित्य को अंततः परास्त कर सकती है, जैसा Andrabi पीठ ने संकेत किया; और क्या न्यायाधीश ज़मानत देने पर “राष्ट्र-विरोधी” तथा इंकार करने पर “बहुसंख्यकवादी” कहलाए बिना स्वतंत्रता की रक्षा कर सकते हैं। न्यायमूर्ति गुप्ता का हस्तक्षेप मूल्यवान है क्योंकि वह विधि-समुदाय को राजनीतिक पक्ष चुनकर प्रश्न समाप्त करने के बजाय उनके गुण-दोष पर विचार करने को बाध्य करता है। “प्रक्रिया ही दंड बन गई है”—यह चुनौती न्यायाधीशों, अभियोजकों, बचाव पक्ष और विधि-विद्वानों, सभी के लिए है।
शायद इसलिए भारतीय स्वतंत्रता के इस संवैधानिक संघर्ष-क्षण में न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की कमी महसूस होती है। इसका अर्थ समकालीन भारत को औपनिवेशिक शासन कहना या उमर ख़ालिद के अभियोजन का पूर्वनिर्णय करना नहीं है। राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त होने और अस्सी वर्ष मनाए जाने के बाद स्वतंत्रता का अर्थ क्या रह जाता है—यह उसी सतत संघर्ष का नाम है। पहली स्वतंत्रता की लड़ाई ने पूछा था: हम पर शासन कौन करेगा? गणराज्य की शांत, किंतु अधिक दैनिक लड़ाई पूछती है: राज्य किसी मनुष्य की स्वतंत्रता कब, किस प्रमाण पर और कितनी देर तक छीन सकता है? 1947 ने विदेशी शासन से स्वतंत्रता दी; 1950 ने वादा किया कि स्वतंत्र भारत में भारतीय राज्य के सामने भी मनुष्य की स्वतंत्रता संविधान से सुरक्षित रहेगी।
त्रासदी यह नहीं कि न्यायमूर्ति गुप्ता अब उमर ख़ालिद को ज़मानत की गारंटी नहीं दे सकते—किसी न्यायाधीश को किसी वादी के परिणाम की गारंटी नहीं देनी चाहिए। त्रासदी यह है कि जब भारतीय ज़मानत-विधि को राज्य और अभियुक्त, बहुमत और अल्पसंख्यक, लोकप्रियता और घृणा—सभी से समान दूरी रखते हुए कठिन प्रश्न पूछने वाले न्यायाधीशों की आवश्यकता है, उच्चतम न्यायालय में उनकी विशिष्ट संवैधानिक आवाज़ अनुपस्थित है। इस पीढ़ी की स्वतंत्रता-लड़ाई पिछली लड़ाई से शांत हो सकती है: न विदेशी संप्रभु, न समुद्र तक मार्च, न सत्ता-हस्तांतरण—केवल यह दैनिक, अनाकर्षक संघर्ष कि 1950 में वादा की गई स्वतंत्रता 2026 में भी मनुष्य के जीवन में अनुभव की जाए। स्वतंत्रता की इसी लड़ाई के क्षण में भारत न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता को याद करता है।





